लोकल ट्रेन में सीट कब्जाने से ज्यादा आसान है तेज गेंदबाजों से मुकाबला : शार्दुल ठाकुर

by sadmin
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नई दिल्ली । शार्दूल ठाकुर ने सन 2018 में हैदराबाद में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था, लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वह केवल 10 गेंद फेंकने के बाद ही चोटिल हो गए और उन्हें टेस्ट टीम से बाहर कर दिया गया। दो साल बाद ऑस्ट्रेलिया दौरे के आखिरी टेस्ट मैच में शार्दूल ठाकुर को एक बार फिर मौका मिला है। भारत के अहम गेंदबाज चोटिल हुए तो टीम इंडिया ने शार्दूल को मौका दिया।
ब्रिसबेन के गाबा मैदान पर शार्दूल ने उस मौके का पूरा फायदा उठाया। शार्दूल ने गेंद और बल्ले से धमाल मचाते हुए भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। शार्दूल ने पहली पारी में 67 रन बनाए। ये रन उस समय निकले जब टीम इंडिया 186 रन पर 6 विकेट गंवाकर संघर्ष कर रही थी। शार्दूल ने पहली पारी में 3 और दूसरी पारी में 4 विकेट भी लिए। शार्दूल ठाकुर से जब एक इंटरव्यू में ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजी के खिलाफ बल्लेबाजी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा तेज गेंदबाजों के खिलाफ बल्लेबाजी से ज्यादा मुश्किल लोकल ट्रेन में सीट पाना है, इसके लिए अच्छी टाइमिंग की जरूरत होती है।
शार्दूल ठाकुर ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन उनकी बल्लेबाजी से तो कुछ ऐसा ही लगा था। शार्दूल ठाकुर ने मिचेल स्टार्क, जोश हेजलवुड और पैट कमिंस जैसे गेंदबाजों पर जबर्दस्त शॉट खेले। शार्दूल ने अपना खाता ही पैट कमिंस की बाउंसर पर छक्का लगाकर खोला था। शार्दूल ठाकुर ने कहा उनके लिए इंतजार करना बहुत ही मुश्किल काम है। हालांकि वह मौके पर चौका लगाने से बेहद खुश हैं। शार्दूल ठाकुर ने कहा मैं हमेशा यही सोचता रहा कि अगला मौका कब आएगा। मेरे पास दो ही विकल्प थे, या तो मैं यह कहूं कि अगला मौका कब आएगा और या फिर मेहनत करता रहूं और इंतजार करूं। मेरे लिए मेहनत करना एकमात्र विकल्प है। मेरे पिता किसान हैं और हमें जिंदगी भर लगातार प्रयास करना ही सिखाया गया है। अगर एक साल खेती खराब हो जाएगी तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं खेती करना बंद कर दूंगा। ऐसा ही क्रिकेट में है, मैं दोबारा कोशिश करूंगा।
शार्दूल ठाकुर ने कहा, मुझे भी मौका नहीं मिलने से निराशा होती है, आप बताइए कौन बाहर बैठना चाहता है, लेकिन अंत में सिर्फ 11 खिलाड़ी ही खेल सकते हैं। मैं दो सीरीज तक बाहर बैठा रहा, मैं भी इंसान हूं, मुझे भी निराशा होती है। मैं बस खिलाड़ियों के लिए पानी और उनका जोश बढ़ाकर खुद को व्यस्त रखता था। मैंने रवि शास्त्री से एक दिन बात की। मुझे कभी-कभी एक सीरीज में एक ही मौका मिलता है और जब भी मैं खेलता हूं मुझे दबाव महसूस होता है, मैं क्या करूं? इसपर रवि शास्त्री ने कहा कि अगर आप इस मौके को दबाव की तरह देखते हो तो आपके ऊपर दबाव ही होगा लेकिन अगर आप जीतना चाहते हो तो दबाव के बावजूद आपके ऊपर कोई दबाव नहीं होगा। रवि शास्त्री की यह बात काम कर गई, शायद इसी वजह से वह ब्रिसबेन की जीत में इतना गजब का प्रदर्शन कर पाए।

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