हरेली जादू-टोना और तंत्र-मंत्र का नहीं, प्रकृति को समर्पित त्योहार

by sadmin
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दुर्ग।  ज्यादातर त्योहार विकृत हो गए हैं. ऐसे ही हरेली त्योहार भी विकृत हो गया है. लोग हरेली को जादू-टोना और तंत्र-मंत्र का त्योहार मानते हैं. लोगों का मानना है कि श्रावण अमावस्या की रात को टोनही जादू-टोना करने के लिए मंत्र सिद्ध करती है. हरेली की रात को टोनही निर्वस्त्र होकर श्मशान घाट के आस-पास साधना करके मंत्र सिद्ध करती है. मंत्र सिद्ध करते समय मुहं में एक प्रकार की कुछ चीज को रखती है और उसके मुंह से टपकने वाली लार आग (अग्नि) के सामान रौशनी उत्पन्न करता है. दूसरी तरफ टोनही, भूत-प्रेत से लड़ने के लिए बैगा, ओझा, तांत्रिक बाबा अपने चेले (शिष्य) के साथ मिलकर मंत्र सिद्ध करते हैं और नया चेले बनाया जाता हैं. ऐसी अफवाह फैलाकर हरेली को अंधविश्वास का त्योहार बना दिया गया हैं. वास्तव में कोई जादू-टोना और तंत्र-मंत्र नहीं होते हैं. दुनिया में ऐसे कोई दिव्य शक्ति ही नहीं है.

हरेली प्रक्रति को समर्पित त्योहार है. यह त्योहार लोगों को पर्यावरण से जोड़ते हैं, अपने घर और आस-पास को साफ-सफाई रखने का संदेश देता है। किसान खेत में लगी लहलहाती हरियाली फसल पर चिला और नारियल फल चढ़ाकर अच्छी फसल की कामना करते हैं. बच्चों के लिए बॉस की गेड़ी बनाई जाती है. बच्चे गेड़ी पर चढ़कर त्यौहार का मजा लेते हैं. इस त्योहार को गेड़ी त्योहार के नाम से भी जाना जाता है।

मजदूर, किसान और कारीगर अपना कार्य करने के औजारों नागर (हल), कुदारी, रापा (फावड़े) आदि सामानों को तरिया (तालाब) से धो-मांजकर लाते हैं. औजार के साथ गेड़ी पर भी चिला, पान और फूल चढ़ाकर पूजते हैं और उस औजारों को सम्हालकर एक सुरक्षित जगह पर रख दिया जाता है, क्योंकि मजदूर-किसान, मेहनतकश अपने रोजी-रोटी कमाने की सामग्री को सबसे बढ़कर मानते हैं. आज इस त्योहार को कई लोग विकृत रूप देकर अंधविश्वास को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं.

अशिक्षित लोगों के साथ पढ़े-लिखे लोग भी अज्ञानी बनकर अंधविश्वास को बढ़ावा देने में भूमिका निभा रहे हैं. हम आज आधुनिक युग में विज्ञान की वस्तु का उपयोग कर रहे हैं. विज्ञान युग में जी रहे हैं, लेकिन अंधविश्वास को मान रहे हैं, ऐसा क्यों? आइए अंधविश्वास, पाखंड और तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाएं और एक बेहतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के देश और समाज बनाएं।

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