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दक्षिणापथ प्रस्तुति। सामाजिक सुधारों की दिशा में कुर्मी समाज सदा अग्रणी रहा। समाज मे ऐसी कई महिला नेतृत्व सामने आए जो पुराने पड़ चुके सामाजिक बन्धनों को तोड़ने की हिमायत की और प्रगतिशील सामाजिक धारा के अग्रदूत बने। इसी कड़ी में सत्यभामा आडिल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आज भी समग्र सक्रियता से सामाजिक हितों का पृष्ठपोषण कर रही है। दक्षिणापथ से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि नवीन सामाजिक चेतना फूंकने के मामले वे बहुत भाग्यशाली रही है। पुरातनपंथी रीतिरिवाज बदलने सम्बन्धी उनके अधिकांश प्रस्ताव का मनवा कूर्मि समाज के संगठन व बुजुर्गों ने सम्मान व समर्थन किया।में 1966 से कूर्मि समाज के लिए एक प्रगतिशील मॉडल बनकर आयी थी । मनवा कुर्मी समाज के महान विभूतियों में से डॉ,खूबचन्द बघेल,,जगन्नाथ बघेल, धनीराम वर्मा बाबूजी,स्वामी आत्मानन्दजी समेत कई अन्य उन्हें समाज के नई पीढ़ी की सुधारक मानते थे।वे कहती है कि बड़ों का मोरल स्पोर्ट मिलना उनके लिए प्रेरक उपलब्धि रही। पर यह रास्ता इतना आसान भी नही था।
30–40% ऐसा भी वर्ग था जिसने मेरी आलोचना की।
विधवा की चूड़ी उतारना धोबी द्वारा जैसा कुप्रथाओं का अंत वक्त का तकाजा था।
यह इसके विरोध में प्रस्ताव तो 1948 में लाया गया था, मनवा समाज में,एक गोंटनिंन द्वारा(नाम भूल रही हूँ), प्रस्ताव का समर्थन स्व,धनीराम वर्मा बाबूजी ने किया था। उस समय में तो बहुत छोटी थी। जब 1966 में सक्रिय हुई तो ज्ञात हुआ कि समाज की प्रकाशित पुस्तको से प्रेरणा लेकर नई परम्परा रखी जा सकती है।लेकिन गांव गांव तक प्रचार प्रसार की कमी इसमें आड़े भी आई। रूढ़िवादी गुणधर्म का अड़चन भी आया। लिहाजा सामाजिक परिवर्तन के सभी विचार क्रियान्वित नहीं हो पाते थे। गांव के लोग-बाग अपनी परंपरा को छोड़ने तैयार नहीं होते थे।
आज भी कहीं कहीं व्यर्थ की परंपराओं को तोड़ा नही गया है, यह चल ही रह है। खास कर विधवा होने पर धोबी द्वारा महिला का चूड़ी उतारना जैसे कार्य समाप्त होना चाहिये।
श्रीमती ऑडिल कहती हैं, अब महिलाएं चारों ओर सक्रिय हो रही हैं , यह बदलाव की सुखद बयार है।इसमें ग्रामीण संगठन को सक्रिय होना जरूरी है।
चर्चा से ही माहौल बनता है।
मानसिकता बनती है। समय लगता है पुराना टूटने व नया बनने में।
1968 में पहली बार मनवा कूर्मि महिला समाज की स्थापना के कई वर्ष बाद दुर्ग,महासमुंद बलौदाबाजार राजनांदगांव, भिलाई में महिला समाज शुरु हुआ।1968 में सरस्वती पूजन के नाम से वसन्तोत्सव कार्यक्रम की शुरुवात हुई। कुछ वर्षों बाद चन्द्राकर महिला समाज का गठन हुआ।1976 में सभी फिरकोंकी महिलाओं का सम्मेलन हुआ तो मुझे निलम्बित करने का भी सामाजिक प्रस्ताव लाया गया, जो बहुमत से निरस्त हुआ।
उस सम्मेलन से प्रेरणा लेकर लखनलाल आडिल ने छत्तीसगढ़ी कूर्मि क्षत्रिय समाज,की स्थापना की। प्रखर समाजवादी नेता स्व कौशिक ने इसका उद्घाटन करते हुए कहा था, ” सत्यभामा नें फिरकों के खेत की मेड़ों को ढहा कर तोड़ दिया। सामाजिक एकता की बाढ़ आ गई”।
बकौल सत्यभामा आडिल मैं केवल यह कहना चाहती हूं कि रूढ़ियाँ तोड़ने व नई रीति रिवाज बनाने के लिए समय लगता है।मानसिक दृढ़ता व संकल्प शक्ति भी चाहिए।
हम आज की युवा पीढी का आव्हान करते हैं, आगे आएं,परिवर्तन की लहर लाएं। केवल पद लेने से कुछ नहीं होता।फूल माला पहनाने से क्रांति नहीं आती।

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