श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में प्रवचन श्रृंखला: दुःख की चर्चा ऐसे करें कि अंदर वैराग्य जागृत हो जाये – देवर्धि साहेब

by sadmin
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दक्षिणापथ, नगपुरा (दुर्ग)। “भगवान महावीर स्वामी ने श्री गौतम स्वामी को पाप-पुण्य कथानकों पर उपदेश दिया। कथानकों का संग्रह श्री विपाक सूत्र के रुप में हमें मिला।श्री विपाक सूत्र हमें संदेश देता है कि पापों की अनुबंध के प्रति जागृत रहें। पुण्य का परिणति सुख है। पाप की परिणति दुख। संसार का नाम ही दुख है। जब तक मोक्ष ना मिले,जब तक संसार में भ्रमण है, दुख पीछा नहीं छोड़ता। ” उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में मुनि श्री प्रशमरति विजय जी ( देवर्धि साहेब) म. सा. ने गौतम स्वामी रचित श्री विपाक सूत्र की विवेचना करते हुए व्यक्त किए।
श्री विपाक सूत्र की विवेचना करते हुए पूज्य देवर्धि साहेब ने कहा कि – किसी भी दुःखी आदमी को देखकर उनका उपहास ना उड़ायें। हमारे मन में उनके प्रति दया का भाव हो। दुःखी आदमी को देखकर आपके आँखों में अश्रु आ जाये तो समझना आपके हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा है। जिनके जीवन में समझ नहीं है वे समय- असमय ईश्वर को दोष देते रहते हैं। बहुत सारे दुःख हमारे जीवन में आता नहीं है, इसकी हमें खुशी नहीं होती। जरा सा दुःख हमें दुःखी कर देता है। व्यक्ति अपने दुःख को गौण कर औरों का दुःख देखता है, उनके दुःखों की कल्पना करता है तो उसे आभास होता है, औरों के दुःख के सामने उनका दुःख बहुत छोटा है। किसी के दुःख की चर्चा, किसी के समस्या की चर्चा, किसी की कमजोरी की चर्चा हम करते हैं, यह पंचायती है। दुःख की चर्चा ऐसा करें कि अंदर से वैराग्य जागृत हो जाये। दुःख ज्ञान देता है। दूसरों के दुःख की अनुभूति से दुःखी मन हल्का हो जाता है। मानसिक रूप से जो तकलीफ हो रही है वह कमजोर हो जाता है। दूसरों का दुःख हमारे दुःख को छोटा बनाता है। जिसे हम दुःख मानते हैं बहुतायत वे हमारे मानसिक विचार हैं। जीवन में अक्सर दुःख होता ही नहीं हम स्वयं दुःख की भूमिका खड़ा कर लेते हैं। हमारे जीवन में जितना दुःख है, उससे हजारों गुणा दुःख हजारों व्यक्ति के साथ है। अन्य का दुःख मेरे दुःख से बड़ा है सोच लिया तो दुःख की पीड़ा नहीं होगी।
दूसरों के दुःख और उसका परिणाम हमें संकेत करता है। पाप के कारण उन्हें इस तरह का दुःख झेलना पड़ रहा है, यह पाप मुझसे ना हो, ऐसा पाप नहीं करूंगा, यह भय उत्पन्न होता है और हमें पापों से बचाने का कार्य करता है। पाप का संचय दुःख के रूप में परावर्तित होकर वापस आयेगा ही यह कटुसत्य है। आप अपने पुण्य को भोगने का अधिकारी हैं तो पापों से उत्पन्न दुःखों को भी स्वीकारना पड़ेगा। अगर सोच सकारात्मक हो, चिंतन जागृत हो तो दुःख विपरीत स्थितियों से जूझने की क्षमता का विकास कर हमारी ऊर्जा को जगाता है।

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